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 जमीन आपल्यावर आवळले जात आहे, ते आपल्याला एका अरुंद शेवटच्या गल्लीतून पुढे ढकलत आहे, आणि तिथून पार होण्यासाठी आपण आपलेच अवयव तोडून फेकत आहोत. ही भूमी आपल्याला चिरडत आहे... Kadachit! आपण तिचे गव्हाचे पीक असतो, जेणेकरून आपण मरून पुन्हा जिवंत झालो असतो. कदाचित! ही भूमी आपली आई असती, जेणेकरून तिने आपल्यावर दया दाखवली असती... शेवटच्या सीमांनंतर आपण कुठे जायचे? शेवटच्या आकाशाच्या पलीकडे पक्षांनी कुठे उडायचे? शेवटच्या श्वासानंतर वनस्पतींनी कुठे विश्रांती घ्यायची? आपण आपली नावे लाल धुक्याने (रक्ताने) लिहू. गाण्याचे हात कलम करून आपण आपल्या मांसाने ते पूर्ण करू. इथेच आपण मरू. इथे, या शेवटच्या वाटेवर. इथे, किंवा तिथे... आपले रक्त आपले ऑलिव्हचे झाड रोवेल.

दीवार में एक खिड़की रहती थी।

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  लेखक : विनोद कुमार शुक्ल प्रत्येक पुस्तक आपल्याला एक कथा सांगते; पण काही पुस्तके अशी असतात जी कथा सांगत नाहीत, तर आपल्या मनात एक नवीन दृष्टी निर्माण करतात. विनोद कुमार शुक्ल यांची ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ ही अशीच एक विलक्षण कादंबरी आहे. साहित्य अकादमी पुरस्काराने सन्मानित झालेल्या या कादंबरीत मोठ्या घटना नाहीत, नाट्यमय वळणे नाहीत, तरीही ती मनावर कायमची कोरली जाते. कादंबरीचा नायक रघुवर प्रसाद हा गणिताचा प्राध्यापक आहे. मर्यादित पगार, साधं घर आणि मध्यमवर्गीय आयुष्य यामध्ये तो जगत असतो. त्याची पत्नी सोनसी ही त्याच्या जीवनातील सर्वात सुंदर गोष्ट आहे. या दोघांच्या नात्यात मोठमोठे संवाद नाहीत, प्रेमाच्या घोषणा नाहीत; पण एकमेकांबद्दलची काळजी, समजूतदारपणा आणि शांत सहवास हेच त्यांच्या नात्याचं खरं सौंदर्य आहे. या कादंबरीतील सर्वात मोहक प्रतिमा म्हणजे ‘खिडकी’. ही खिडकी फक्त भिंतीतील एक उघडी जागा नाही, तर ती स्वप्नांची, आशेची आणि अंतर्मनातील स्वातंत्र्याची वाट आहे. त्या खिडकीतून दिसणारे जग वास्तवापेक्षा अधिक सुंदर आहे. जणू लेखक सांगतो की, जग बदलण्यापेक्षा ते पाहण्याची दृष्टी बदलली तर आ...

सोनम वांगचुक यांचे उपोषण गांधीवादी नाही!

  सोनम वांगचुक उपोषणावर आहेत. मोदी सरकारला याने काहीच फरक पडत नाहीये. त्यांचे समर्थक आता अशी आळवणी करत आहेत की, राहुल गांधी आणि इतरांनी त्यांच्या समर्थनासाठी पुढे आले पाहिजे. अनेक जण केवळ या विचाराने आनंदित आहेत की, गांधीवादी मार्गांचा पराभव होत आहे. काही जण तर असेही म्हणू लागले आहेत की, गांधीवादी उपोषणे आणि मार्ग केवळ म्हणूनच यशस्वी झाले, कारण ब्रिटिश हे त्यांच्यासाठी एक 'मित्र-विरोधी' (मवाळ विरोधक) होते; जर हिटलर समोर असता तर गांधी अपयशी ठरले असते. तसेच, अनेक जण या सिद्धांताची (थियरीची) पुन्हा मांडणी करू लागले आहेत की, ब्रिटिशांनी गांधींचा वापर एक 'सेफ्टी-वाल्व्ह' (सुरक्षा झडप) सारखा केला होता आणि क्रांतिकारकांची जागा संपवण्यासाठी गांधींना प्रोत्साहन दिले होते. यातील प्रत्येक गोष्ट चुकीची आहे सगळ्यात आधी हे समजून घ्या की, गांधींनी ब्रिटिशांविरुद्ध कधीही कोणतेही उपोषण केले नव्हते. ते इतके भाबडे नव्हते किंवा अशा कोणत्याही भ्रमात नव्हते की, आपण उपोषण करू आणि ब्रिटिश नमतील. मग गांधी उपोषण का करायचे? या विषयावर आपण नंतर येऊ. त्याआधी एक आठवण करून देऊया. पंधरा वर्षांपूर्वी, ...

अंतिम विदाई

 किसी ने घर की बेल बजाई, तब वो नींद में थी। अक्सर बेल की आवाज़ सुनकर वो डर जाती है, खासकर दुपहर में, जब उस माले पर कोई नहीं रहता, वो उस इमारत के अंतिम माले पर रहती है। इस समय पर सब लोग अपने–अपने काम पर चले जाते हैं। अनु जब दरवाज़े के पास गई तब बाहर उसे बहुत शोर सुनाई देने लगा। पीपहोल से उसने देखा तो बाहर बहुत से लोग खड़े थे। उनमें से कोई चुपके से आँसू पोंछ रहा था तो कोई चीख-चीखकर रो रहा था।  अनु के हाथ-पैर पहले से ज्यादा काँपने लगे। उसके मन में तरह-तरह के सवाल उठने लगे, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करे, दरवाज़ा खोले या न खोलकर ऐसे दिखाए जैसे घर में कोई नहीं है।  इस बीच दुबारा से बेल बजी, और इस बार उसने झटके से दरवाज़ा खोल दिया। बाहर खड़ी एक औरत ने पूछा- “क्या आप मुझे पीने के लिए थोड़ा पानी दे सकती है?” अनु उस औरत को न देखते हुए उसमें पीछे जमी लोगों की भीड़ को देख रही थी। पक्का कुछ तो अघटित हुआ है— जिससे वो अनजान है।  अनु के माथे पर उठी परेशानी की लकीरें भाँपकर उसी औरत ने कहा— “वो शांता..” इससे पहले की वो आगे कुछ कहती अनु पड़ोस की शांता दादी के दरवाज़ें में खड़ी होकर...

"अकेलेपन से एकांत की ओर l"

 २८/०६/२०२४ एक वक़्त बाद अकेलापन इतना अकेला महसूस होने लगता है मानो वहाँ हमारा होना भी एक भ्रम जैसा हो| ख़ुद से बात करने के लिए कुछ नहीं बचता| कुछ नया करने से पहले ही मन ऊब जाता है| अकेलापन चुभना शुरू कर देता है| हम खोजने लगते है एक ऐसी जगह जहाँ से सब कुछ इतना भरा हो कि हमें अकेलापन का पता ही न चले| अंततः हम व्यस्तता का हाथ थाम लेते है| (अकेलापन तब खलने लगता है जब हम अकेले होने का मूल्यांकन करना शुरू कर देते है|) फ़िलहाल मैं छत के एक कोने में बैठकर अपने आसपास की दुनिया को देख रहा हूँ| कितनी अस्थिर है दुनिया| लगातार भाग रही है भीड़ से अकेलेपन की ओर और अकेलेपन से भीड़ की तरफ़| कुछ को कहीं-न-कहीं पहुँचने की जल्दी है और कुछ को कहीं लौटने में अभी देरी है| हालाँकि मुझे इस पल में ठहरे रहने का सुख, दूसरों के दुःखों को महसूस करके नहीं गवाना है|  आज पहाड़ काफ़ी साफ़ दिख रहे है| पंछी आसमान में लम्बी और ऊँची उड़ान भर रहे हैं| कितना सुख मिलता है प्रकृति के आश्चर्य से बार-बार आश्चर्यचकित होने में| एक ठंडी हवा का झोका जैसे ही बदन छूता है वैसे ही एक सिरहन भीतर दौड़ लगाने लग जाती है| मैं भूल गय...

पहचानना प्रेम

 पहचानना प्रेम ————— जब मन हो  बहते नल सा और पानी का भी  संकट हो  जब जेबें हों  ख़ाली ख़ाली  और मन  घर भामाशाह का हो  दिल बजे  कुकर की सीटी सा  कोई दाल भात  में घी सा लगे   कोई दाल भात  में घी सा लगे  चलती लू में  आये वो और बर्फ़ का  गोला हो जाओ  चलती लू में  आये वो और बर्फ़ का  गोला हो जाओ  किसी के आने  भर से जब  महके दोपहर  रातरानी सी  जब खड़ी हो वो  दरवाज़े पर  और चैन  साईकल की उतरे  जब ऐंठ हो  नई अमीरी सी  और आसमान पर  पाँव पड़े  जब ना सोचा  भी हो जाये  तभी समझना  प्रेम में हो 

यू ही

 8:29 रात के कुछ पौने पांच बज रहे हैं.. कमरे में बहुत धीमी रोशनी है उस रोशनी में मेरी परछाईं नाच रही है.. खुशी से नहीं बहुत गम में। कमरे की दीवारें सुन रहे हैं ये पंक्ति जाना तुमको जाना हो तो मत आना। कुछ देर पहले ही विक्रांत मेस्सी का इन्टरव्यू देखा.. और एकदम नज़दीक़ खुद को टूटा हुआ हताश महसूस किया है। हर बार टूट जानें पर तुम एक ही शख्स के पास बार-बार नही जा सकते हो इसलिए नही की वो तुमसे थक जाएगा बस इसलिए क्योंकि तुम खुद से थक चुके हो। उदासी से भरा शरीर सिर्फ़ एक लाश है जिसे देखनें सुननें का श्राप है। ~प्रवीण स्मृतीया 

सफर

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 12:43  तुमसे प्रेम करना ही मेरे सबसे कठिन कार्यों में से था।उस व्यक्ति से प्रेम करना बहुत सरल होता है , जिसके इर्द-गिर्द केवल हवाएं बहती हो सूखें पत्तों कि आवाजें आती हो ,मगर तुम्हारे इर्द-गिर्द तो केवल लोग है, तुम्हारा हाथ थामने के लिए भी न जाने मुझे कितनी आँखों की गिरफ्त से गुज़रना पड़ेगा।

"विपदा "

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  भविष्य की सबसे बड़ी  विपदा हो सकती है  ज़मीन का सूखना, हालाँकि वर्तमान की सबसे  बड़ी विपदा है  मानव की सिसकियों का सूखा पड़ना|

//तुम जहाँ भी रहते हो//

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  ये आदतन रूठी निगाहें ये महकी–महकी बाहें  कि दिल फ़रिश्ता बन बैठा है तुम्हारा नाम सुनकर ये उजला सा नूर ये लब, ये सुरूर मानो ख़ुदा ने भेजे हैं  एक पैग़ाम बनकर ज़िंदगी है की मानती नहीं तुम किसी की चाह हो मैं जो भटक जाता हूँ तुम वीराने की राह हो तुम्हारी तस्वीर को देख मेरा मन ये बातें करता है कि तुम जहाँ भी रहते हो मेरा दिल भी वहीं रहता है स्मृतियाँ, (१९ जनवरी)

पुराने और साधारण दिन

कुछ नया, कुछ अलग की ख़ोज में हम पुराने और साधारण हो जाते हैं... [ये पुराने और साधारण दिन हैं]   मेरे पास फ़िलहाल कुछ ऐसा नहीं है जिसे मैं नया कह सकूं। जिससे सबको बता सकूं कि मैं तुमसे अलग हूँ। अलग होना असल में अलग रहने से शुरू होता है। मैं हमेशा से सबसे अलग रहना चाहता था। इसलिए नहीं कि मुझे अलग होना था, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मुझे उस शून्य को सुनना था जो बचपन में घर में अकेले खेलते वक्त सुनाई देता था। गर्मियों की छुट्टियों में ताश की ईमारत बनाता था। डर हवा का था कि एक ताश का पत्ता हिला तो सारे ताश मिट्टी में मिल जाएंगे। तब नहीं पता था कि जीवन उस एक ताश के पत्ते पर टिका हुआ है। जो सबके लिए अलग हो सकता है। मुझे इस नये घर में भी पुराना घर दिखता है। अब वो सपनों में भी आने लगा है। ख़ासकर वो एक खिड़की जो मेरे लिए धूप और बारिश दोनों को छूने का जरिया थी। स्कूल से विदा लेने तक वहाँ पढ़ाई की थी। पढ़ाई से ज्यादा वहाँ बैठकर लिखा था। लिखना यानी कुछ भी लिखना, जो मन बहलाने के लिए काफ़ी हो। हज़ार बातें हैं जिसे यादें कह सकते हैं।  हम कमरे में कभी अकेले नहीं रहते, हमेशा कोई न कोई छिपकली हमसे पहल...

लकीरें

हम मिट्टी से बने, ऊपर से पत्थर दिल पर भीतर से टूटे हुए लोग हैं जिन्होंने घरों से लेकर ईश्वर तक  पहाड़ों से लेकर नदियों तक बस लकीरें खींच डाली पर धरती पर चार लकीरें खींचने से  और उन चार हिस्सों को चार नाम देने मात्र से दुनिया नहीं बनती है दोस्त दुनिया बनाने के लिए लकीरें तोड़नी पड़ती हैं पर हमने न लकीरें तोड़ी न अपने उस टूटे हुए हिस्से के बारे में कुछ कहा वैसे कितना कुछ कहा जा सकता था टूटे हुए सपनों के बारे में रूठे हुए अपनों के बारे में पैरों के घाव के बारे में छोड़े हुए गांव के बारे में गुज़र गए लोगों के बारे में और कितना कुछ था लिखने को... पर हम चुप रहें; चुप रहें, इसलिए नहीं कि हमें कहना नहीं आता बस इसलिए क्योंंकि टूटे हुए पर लेकर परिंदे सिर्फ़  आसमान की ओर इशारा कर सकते हैं  पर किसी को उड़ना नहीं सीखा सकते। स्मृतियाँ, (२०२२)

जीवन एक सड़क है

वह सोच रही थी कि कौन सी किताब पढ़ी जाएं। पढ़ने के लिए बहुत सारा हैं पर चुनने के लिए बहुत कम। उसने अधूरी पढ़ी किताब चुनी। उस अधूरे पढ़े को कई महीने हो गए हैं। किताब लेकर वो बैठ गई पर वो अब किताब नहीं पढ़ रही है बल्कि अपने दिनभर के थकान का हिसाब लगा रही है। उस वक्त का हिसाब लगा रही है जब वो अपने होश खो बैठी थी। साथ ही सोच रही है कि और किस चीज़ का हिसाब लगाया जाए। हालाँकि वो हिसाब–किताब में अच्छी खासी कच्ची है। कोई उससे कुछ पैसे उधार ले जाए तो उसको वापस माँगना नहीं आता। कोई मज़ाक में चाय पिलाने को कह दे तो सच में चाय पीला देती है। एक बार किसी ने उससे कहा था “योग्यता तुम अपने दिमाग की सुना करो, दिल की सुनोगी तो भटक जाओगी।“ उस दिन के बाद उसने अपनी दिल की सुनना छोड़ दिया।   आज कॉलेज से आने में उसको देर हो गई क्योंकि रास्ते में ट्रैफिक इतना था कि पैदल चलने वाले लोग गाड़ियों से आगे निकल रहे थे। सड़क पर गाड़ियों की संख्या देखकर मैं डर गई थी। सुविधाएं किस हद तक जा रही हैं, इंसान कभी हद में नहीं रह सकता, उसको हमेशा सब हद के बाहर चाहिए। बस से उतरके उसको एक सड़क पार करनी पड़ती थी। वहाँ से एक सँकरी गली ...