किसी ने घर की बेल बजाई, तब वो नींद में थी। अक्सर बेल की आवाज़ सुनकर वो डर जाती है, खासकर दुपहर में, जब उस माले पर कोई नहीं रहता, वो उस इमारत के अंतिम माले पर रहती है। इस समय पर सब लोग अपने–अपने काम पर चले जाते हैं। अनु जब दरवाज़े के पास गई तब बाहर उसे बहुत शोर सुनाई देने लगा। पीपहोल से उसने देखा तो बाहर बहुत से लोग खड़े थे। उनमें से कोई चुपके से आँसू पोंछ रहा था तो कोई चीख-चीखकर रो रहा था। अनु के हाथ-पैर पहले से ज्यादा काँपने लगे। उसके मन में तरह-तरह के सवाल उठने लगे, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करे, दरवाज़ा खोले या न खोलकर ऐसे दिखाए जैसे घर में कोई नहीं है। इस बीच दुबारा से बेल बजी, और इस बार उसने झटके से दरवाज़ा खोल दिया। बाहर खड़ी एक औरत ने पूछा- “क्या आप मुझे पीने के लिए थोड़ा पानी दे सकती है?” अनु उस औरत को न देखते हुए उसमें पीछे जमी लोगों की भीड़ को देख रही थी। पक्का कुछ तो अघटित हुआ है— जिससे वो अनजान है। अनु के माथे पर उठी परेशानी की लकीरें भाँपकर उसी औरत ने कहा— “वो शांता..” इससे पहले की वो आगे कुछ कहती अनु पड़ोस की शांता दादी के दरवाज़ें में खड़ी होकर...
पहचानना प्रेम ————— जब मन हो बहते नल सा और पानी का भी संकट हो जब जेबें हों ख़ाली ख़ाली और मन घर भामाशाह का हो दिल बजे कुकर की सीटी सा कोई दाल भात में घी सा लगे कोई दाल भात में घी सा लगे चलती लू में आये वो और बर्फ़ का गोला हो जाओ चलती लू में आये वो और बर्फ़ का गोला हो जाओ किसी के आने भर से जब महके दोपहर रातरानी सी जब खड़ी हो वो दरवाज़े पर और चैन साईकल की उतरे जब ऐंठ हो नई अमीरी सी और आसमान पर पाँव पड़े जब ना सोचा भी हो जाये तभी समझना प्रेम में हो
२८/०६/२०२४ एक वक़्त बाद अकेलापन इतना अकेला महसूस होने लगता है मानो वहाँ हमारा होना भी एक भ्रम जैसा हो| ख़ुद से बात करने के लिए कुछ नहीं बचता| कुछ नया करने से पहले ही मन ऊब जाता है| अकेलापन चुभना शुरू कर देता है| हम खोजने लगते है एक ऐसी जगह जहाँ से सब कुछ इतना भरा हो कि हमें अकेलापन का पता ही न चले| अंततः हम व्यस्तता का हाथ थाम लेते है| (अकेलापन तब खलने लगता है जब हम अकेले होने का मूल्यांकन करना शुरू कर देते है|) फ़िलहाल मैं छत के एक कोने में बैठकर अपने आसपास की दुनिया को देख रहा हूँ| कितनी अस्थिर है दुनिया| लगातार भाग रही है भीड़ से अकेलेपन की ओर और अकेलेपन से भीड़ की तरफ़| कुछ को कहीं-न-कहीं पहुँचने की जल्दी है और कुछ को कहीं लौटने में अभी देरी है| हालाँकि मुझे इस पल में ठहरे रहने का सुख, दूसरों के दुःखों को महसूस करके नहीं गवाना है| आज पहाड़ काफ़ी साफ़ दिख रहे है| पंछी आसमान में लम्बी और ऊँची उड़ान भर रहे हैं| कितना सुख मिलता है प्रकृति के आश्चर्य से बार-बार आश्चर्यचकित होने में| एक ठंडी हवा का झोका जैसे ही बदन छूता है वैसे ही एक सिरहन भीतर दौड़ लगाने लग जाती है| मैं भूल गय...
Comments
Post a Comment